परिचित से परिचय

मैंने सोचा क्यों न उस भाषा में लिखूं

जिस भाषा में सोचता हूँ

मैंने कुछ लिखा, बचपन से उधार लेकर

मेरा लेख, एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ

मेरा उत्साह बढ़ा, और मैं लिखने लगा

उस भाषा में, जिस भाषा में सोचता हूँ


यह लेख उतने ही मेरे हैं, जितने हैं आप के

इसके सभी पात्र आपके परिचित हैं

इसमें लिखी हर बात आपकी जानी पहचानी है

इन्हे आप तक पहुंचने का प्रयास किया है मैंने

समय समय पर परिचित से परिचय

मात्र औपचारिता नहीं, आवश्यकता भी बन जाती है

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