मरीचिका

समंदर के किनारे बैठकर, लहरों को गिन रहा था

गिनते गिनते बह गया, समंदर के बहाव में

ना-समझ तैराकी की तरह तैरता चला गया

खो गया बीच समंदर में, पूरी तरह खोने से पहले

दिखी आशा की किरण, दिखा किनारा, कहीं दूर

पास पहुंचा, मरीचिका हाथ लगी

कब तक भटकता रहूं, किनारे की खोज में