रूपान्तर

बहती धारा में बहता चला गया मैं

होने लगी परेशानी स्वयं को पहचानने में

पूरी तरह खोने से पहले, जगाया मुझे मेरे अहसास ने

अब समय था मुक्ति पाने का, बनावट की हथकड़ियों से

समय था बहती धारा से निष्काषित होने का

समय था स्वयं के पास लौटने का

समय था रूपान्तर का

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh