उसकी आँखों की महकती खुशबु

वो आई, बहुत सारी हंसी लेकर

इधर-उधर की बातें की और मुझे लगा

सिर्फ मेरे लिए ही बनी है वो

कुछ समय बाद ट्रैन उसके गंतब्य पहुंची

वो उतरी ट्रेन से, अजनबी सी

मानो कभी मिले ही न हो

लगा, शायद एक बार पीछे मुड़कर देखेगी

उसी हंसी के साथ, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ

ट्रेन फिर से चली मेरे गंतब्य की ओर

अपनी सीट जो उसको दे रखी थी मैंने, मेरी हुई

अगले चार घंटे कैसे बीत गए

उसकी यादों के सहारे

पता न चला

अक्सर याद आती है

उसकी आँखों की महकती खुशबु