फेल के बाद पास

इलाहाबाद से ट्रेन पकड़नी थी

कानपूर के लिए, माँ भी साथ थी

सोचा, चार-पांच घंटे का सफर है

अख़बार खरीद लेते हैं रास्ते में पढ़ने के लिये

अमृत बाजार पत्रिका ख़रीदा गया

उन दिनों बिन-आरक्षण भी

यातायात की सुविधा हुआ करती थी

माँ ने एक सीट आरक्षित कर रखी थी मेरे लिए

सीट पर, आराम से पैर उठाकर, अख़बार खोला

तीसरे पन्ने पर पहुंचे ही थे

एक जोर सा झटका जोर से लगा

पैसेंजर ट्रेन के झटके से ज़्यदा

मेरा रिजल्ट निकला था

मैं फ़ैल हो गया था

पूरी तरह नहीं, आधी तरह

एक सब्जेक्ट में फेल हो गया था

दुबारा इम्तिहान देकर पास हो सकते थे

मेरे ह्रदय की गति रुक सी गई

पहली बार जो फेल हुए थे

माँ ने मेरी ओर देखा, मैंने माँ की ओर

किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा

दोनों चुपचाप बैठे रहे, चार घंटे, घर पहुंचे

मेरा फेल होना, कोई बड़ी बात न थी

जैसे पहले से निश्चित था

क्या फर्क पड़ता है, एक साल ज्यादा या कम से

अगर चाहूँ तो पास हो सकता हूँ इस साल ही

किसी सरकारी दफ्तर में क्लर्क ही तो बनना है

कौन सा इंजीनियर या डॉक्टर बनना है

किसी को मुझसे, किसी तरह की, कोई उम्मीद न थी

सिवाय माँ के

मैंने माँ से कहा, एक बार और कोशिश करने दो

माँ ने कहा, तो किसने रोका है

मैंने कहा, कोई राज़ी भी तो नहीं

मेरे साल बर्बाद करने से

आज भी याद है मुझे माँ के वो शब्द, मैं हूँ न

तुम पढ़ो, मैं भी तुम्हारे साथ पढूंगी

तुम फेल होने के लिये नहीं बने हो

नहीं पढ़ा, फेल हुए, पढोगे पास होगे

मुझे याद है वो दिन

मार्क-शीट लेकर आया डाकिया जिस दिन

मैं भी पास हुआ, मेरी माँ भी पास हुई

मेरी माँ तो मेरी माँ ही रही

मैं क्लर्क बनते-बनते प्रोफेसर बन गया