बीस साल बाद

बीस साल पहले

मैं एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने की ओर मुड़ा

हरा-भरा बगीचा छोड़कर नये उपवन से जुड़ा

नया वातावरण, नया बाग, नये पौधे, नई ज़मीन मिली

निश्चित को छोड़ अनिश्चित से जुड़ा

'सरकार' की छत्रछाया से निकलकर

एक 'परिवार' की छत्रछाया में आया !

उन दिनों, हर दिन, अपने पुराने ठिकाने जाता

और नये ठिकाने न लौटने का निश्चय करता

लेकिन लौट आता अपने नये ठिकाने

कब बीस वर्ष बीत गये, पता न चला

इन बीस वर्षों में बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ खोया

पुराने साथी छूटे, नये साथी मिले

एक नई पहचान मिली

एक छत्रछाया से जुड़ा, बहुतों से वंचित हुआ

कितने सपने देखे और कितने दफनाए

समय कभी तो आगे बढ़ा तो कभी पीछे हटा

हृदय - धमनियां परिवर्तित हुई, मन-चेतन हुआ

बीस वर्षों का संचय, कैसे समेटूं

या यूं ही बिखरा रहूँ, अपनों में

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh