रचना

उसकी रचनायें जैसे खुली किताब

मानो बनाई गई हो व्यक्तित्व निखारने के लिये

जिनका आधार एक सत्य है

जिस सत्य का जन्म विश्वास ने दिया

रचनायें बिकने या दिखने के लिये नहीं

निराकार को आकार देने के लिये रची गई है

जिस दिन प्रतिमा को आँख़ें मिलीं

उस दिन रचयिता ने आँखे मूंदी

एक सत्य की मृत्यु ने

एक कल्पना को साकार किया

एक मिट्टी ने

एक मिट्टी को

दिया मूर्त रूप

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh