कौन आया मेरे मन के द्वारे

रात का समय था ! मन के द्वार पर किसी को दस्तक देते सुना मैंने! दरवाजा खोला !

एक दिव्यमान प्रकाश, मुझे देखते मुस्कराये, और बोले "मैं ईश्वर हूं ! "

आधी रात का समय था ! आँखे नींद से भरी हुई थी ! दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था !

क्या करूं, क्या कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था ! कह रहे हैं, ईश्वर हैं, तो क्या मैं मान लूं !

ईश्वर अंतर्यामी है ! मेरे मन की बात समझ गये !

बोले, “राही कई तरह के होते है, और राह दिखाने वाले भी ! तुम्हारी मर्जी तुम जिसे स्वीकार करो !”

मैंने पूंछा, तुम्हारे नाम से परिचित हैं सभी। देखा किसीने नहीं। कुछ परेशां रहते हैं तुम्हारे अस्तित्व को लेकर। कुछ परखना चाहते हैं तुम्हें। जानना चाहते हैं, अगर तुम जीवित हो, सामने क्यों नहीं आते।

ईश्वर ने कहा, मुझे परखना एक ख्याली प्रयोग के सामान है। ख़याली प्रयोग, एक ऐसा प्रयोग जो सोचा तो जा सकता है, किया नहीं जा सकता। शायद परिचित होगे इस ख़याली प्रयोग से। एक काळा डब्बे में बंद हैएक बिल्ली। पता लगाना है, बिल्ली जीवित है या मृत। डब्बे के खुलने के बाद ही पता चल सकता है, बिल्ली जीवित है या मृत। बिल्ली का जीवित रहना निर्भर करता है, डब्बे में राखी उस वस्तु पर, जो डब्बे के खुलतेही खो देती है बिल्ली को जीवित रखने की क्षमता। यही है इस प्रयोग की बिडम्बना। मैं एक काले डब्बे में बंद हूँ। मैं जीवित भी हूँ और मृत भी। मेरी कल्पना की जा सकती है, रचना नहीं। असंभव है मुझे मापना। तुम्हारा विश्वाश मुझे ज़िंदा रखता है। मैं हूँ तुम्हारा काल्पनिक बंधू। तुम्हें मेरी आवश्यकता है।

मैंने पूंछा , गुरुवर आपके प्रति विश्वास किसी डर के, या प्रेम के कारण है !

मेरे इस प्रश्न ने ईश्वर को विचलित न किया ! बोले, "देखो भाई, क्यों कोई किसी से डरता है यह तो वही जानता है मैं तो सिर्फ यह जानता हूं कि तुम मेरा मन से आदर करते हो !”

मैंने एक और अविवेकी प्रश्न पूँछ डाला ! आपने सज्जनों के साथ दुर्जनों की रचना क्यों की ?

ईश्वर बोले," संवेदनशील कभी राक्षस नहीं बनाता है ! तुम्हारी समस्याये तुम्हारी हैं! तुम्हे ही उनके समाधान ढूंढने हैं ! मैं सिर्फ यह कहना चाहूंगा, अपने दोषों की स्वीकारोक्ति एक कला है ! और तुम्हे यह कलासीखनी चाहिए !”

मैंने पूंछा, क्या गैलिलियो तुम्हारा शत्रु था। ईश्वर ने कहा, “हर युग में रहा हूँ मैं। गैलीलियो के युग में भी मैं मौजूद था ! नहीं गेलिलियो मेरा शत्रु नहीं था ! मैं शत्रु या मित्र नहीं बनाता ! मैं मानता हूँ गेलिलियो के साथ अन्याय हुआ था ! लेकिन उस अन्याय का जिम्मेवार मैं नहीं, तुम थे ! तुम तो ये भी कहते हो डार्विन मेरा सबसे बड़ा शत्रु था क्योंकि उसका कहना था मेरे बिना जीवन सम्भव है ! ठीक ही तो कहा था डार्विन ने ! मेरा भी तो मानना है मेरे हस्तक्षेप बिना सम्भव है उत्पत्ति जीवन की ! तर्क चलता रहेगा मेरे बारे में तब तक, जब तक मृत कार्बन को जीवित न कर पाओगे तुम !

मैंने पूंछा, क्या उचित है आपकी रचना करना?

एक पूर्ण रचयिता का रूप धारण कर ईश्वर बोले, " जानते हो न, योजना बनाना और उसका मूर्त रूप देना

दो अलग बातें है ! मेरी रचना से पहले एक आदर्श व की रचना करनी होगी ! मेरे शब्दकोश में आदर्श का तात्पर्य सर्वोत्तम से है !”

मैंने कहा, मेरे शब्दकोश में आदर्श में कई अनादर्श घटक भी शामिल है !

ईश्वर को मेरा तर्क पसंद आया ! उत्साहित स्वर में बोले, "तुम्हारे पास बुद्धि है ! तुम सजग हो ! तुम निर्माता हो !"

मैंने पूंछा, हमें बनाते समय क्यों की इतनी गलतियां ?

ईश्वर बोले, “ हाँ, मैंने जान – बूझकर की गलतियां! विविधता की जरूरत है ! विविधता लाने के लिए गलतियों के सिवाय, है कोई उपाय ?”

थोड़ी देर चुप रहने का बाद ईश्वर बोले,“ अगर तुम मेरा अस्तित्व प्रमाणित करना चाहते हो, तो नहीं कर पाओगे ! क्या असीम को शब्दों में या विचारों से बांध सकते हो ! मैं हर जगह हूं, क्या तुम हमें देख पाते हो ! मैंकेवल तुम्हारा विश्वास हूं ! जितना तुम मुझसे छुटकारा पाना चाहोगे, उतना ही मै तुम्हारे नजदीक आता चला जाऊंगा ! जितना तुम मेरे बारे में जानना चाहोगे, उतना ही तुम मेरे बारे में अंजान बन जाओगे !"

मैंने कहा, तो क्यां करूं ! छुटकारा पाने की कोशिश करूं, या निकट आने की !

ईश्वर बोले, “जो भी करो, मेरे अस्तित्व की अवहेलना नहीं कर पाओगे ! तुम सुरक्षित हो, जब तक मैं सुरक्षित हूं ! क्या फर्क पड़ता है, किसने किसकी रचना की ! प्रगति सहज से जटिल की ओर होती है ! अगर मैंजटिल हूं, तो तुम पहले आये ! अगर तुम जटिल हो, तो मै पहले आया ! एक दूसरे के पूरक है हम ! जैसे पूरक हैं सहज और जटिल। तुम हो तो मैं हूं ! मैं हूं तो तुम हो !"

मैंने कहा, कुछ आपके अस्तित्व को लेकर चिंतित रहते हैं !

ईश्वर ने कहा, " मेरा अस्तित्व जरुरी है ! मेरी वजह से तुम्हारा जीवन नियमित होता है!"

मैंने कहा, आपको पाना, सहज भी तो नहीं !

ईश्वर बोले, " हर जगह पा सकते हो मुझे ! असीमित आकाश की तरफ देखो, मुझे देख पाओगे ! मुझे चरम शक्ति के रूप में देखना चाहते हो तो देखो सूरज की ओर !”

मैंने कहा, आपसे मिलने से पहले आपके बारे मे कई धारणाये अस्पष्ट थी !

ईश्वर बोले, "क्या वास्तव में तुमने मुझे देखा है! अगर तुम सोचते हो तुम में मुझे देखने की क्षमता है, तो तुमने मुझे देखा है ! मेरा अस्तित्व है की नहीं, क्या फर्क पड़ता है! मैं एक सीधी रेखा हूं ! तुम पर निर्भर करता हैकि तुम मुझे सीधी रेखा के रूप में देखते हो या एक त्रिकोण के रूप में ! "

ईश्वर की बातों में सम्मोहन शक्ति थी ! मुझे उनकी बातें, बिना परखे, विश्वास होने लगी ! सुबह होने वाली थी मेरी आँखे पूरी तरह से खुल चुकी थी ! मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और कहा, मैं जान गया हूं ईश्वर कोसमझने के लिये मन में पवित्रता होनी चाहिये ! ईश्वर को जानने के लिये जानने की क्षमता होनी चाहिये ! मैंने कहा, आशा करता हूं फिर से मिलने का अवसर मिलेगा!

ईश्वर ने कहा, "ईश्वर ने चाहा तो शीघ्र ही फिर मिलेंगे !"