कोई चला गया

कोई चला गया कुछ टेढ़े-मेढ़े सवाल छोड़कर

अटल था वो, जानता था, परिवेश से पृथक ऊँचाई में सच्चाई है, गहराई नहीं

ऊंचे पहाड़ पर पेड़ उगाने की ब्यर्थ कोशिश न की उसने कभी

घास पर चलने की आदत सी बना ली थी उसने

भीड़ में खोकर भी स्वयं को पहचानता था वो

कहता था, मेरे प्रभु, मुझे इतनी ऊँचाई मत देना

की ग़ैरों को गले न लगा सकूँ मैं

कोई अपना मन में उजियारा भरने वाला चला गया

धूमिल शोर की तरह गुम हो गया

भैरों घाट के सन्नाटे में, बरसों की यादें समेटकर

इतिहास के पन्ने पर, मिलने का वादा कर

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh