देखा है मैंने तुमको कानपुर की गलियों में

बचपन से सुन्दर है कोई समय

जहाँ बचपन बीता, उससे सुन्दर है कोई जगह

दूर चला आया हूँ कानपूर की गलियों से

जहाँ नंगे खेला करते थे, कुछ यादें समेटकर

गंदा शहर है , सिर्फ रिक्शे चलते हैं

चमड़े से बने इस शहर में रहना मुश्किल है

यही सब सुनता था, जब रहता था

कुछ नहीं दिखता था, जब रहता था

दिखते थे पंडितजी के गोल गप्पे, ननकू के पान

और दो पैसे में जेब भर मूंगफली

चमड़े से बने इस शहर में भाईसाब रहते थे, बुआजी रहती थी

गंदा है, तो है , शहर तो मेरा है

अपने शहर में दिखता था , कोरा मैं

जो एक क्लर्क बनने की ख्वाहिश रखता था

दो पैसे की ख्वाहिश वो भी पूरी न कर पाया

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh