सुनाते हैं एक बेटे की कहानी

आरक्षण स्थल पर बैठा वो नवयुवक

निर्दिष्ट काम के साथ कर रहा था

क्रमबाह्य आरक्षण, कुछ अति-विशिष्ट व्यक्तियों के

अकस्मात एक वृद्धा को आते देखा उसने

परेशान, घबराई सी, छूट गई थी, जयपुर वाली गाड़ी उसकी

बेटा रहता है जयपुर में, आरक्षण चाहिए, अगली गाड़ी में

काउंटर पर बैठे 'बेटे' ने 'माँ' का दर्द समझा

माँ को आरक्षण मिला, माँ खुश हुई, धन्यवाद जताया

और साथ ही रख दिये बेटे की हथेली में, सौजन्य स्वरुप कुछ रूपये

बेटा मरमाहत हुआ, उसने कुछ न कहा, मन ही मन बड़बड़ाया

कैसे धोखा दे सकता हूँ मैं एक माँ को

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh