अथाह समंदर

नींद की बेहोशी में मुझे दिखा समंदर का दूसरा छोर दूसरे छोर को देखने के बाद इस छोर की सुंदरता और बढ़ गयी नींद की बेहोशी में ही मैंने मुझसे कहा, पीछे मुड़ मैं मुड़ा, इस छोर से जुड़ा वर्तमान मेरा इंतज़ार कर रहा था कहने लगा, कुछ ही क्षणों का अतिथि हूँ संवार लो, न जाने कब व्यतीत बन जाऊं