महकती खुशबु की तलाश में

उनकी आँखों में दिखता था गुलाब

दिखते थे चाँद तारे

निकलता था दिन महकती खुशबु की तलाश में

आँखों में आँखे डालकर बातें होती थी

धीरे धीरे आँखों को चश्मे की ज़रूरत पड़ने लगती है

गुलाब की जगह कांटे दिखने लगते हैं

दिखता है अपमान, भय, घृणा, पश्चाताप

आंखे बता देती हैं दिल का हाल

आँखों में आंखे डालकर बातें कम होने लगती है

इतने मशगूल हो जाते है बाहरी समझौतों में

जानना नहीं चाहते है एक दूसरे का हाल

घूम फिरकर फिर समय आता है

बारीकियों को समझने का

फासले कम होते नज़र आते हैं

नये चश्मे की ज़रूरत पड़ती है

आँखों में आँखे डालकर बातें फिर शुरू होती हैं

महकती खुशबु की तलाश में फिर से दिन निकलता है