सुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना

याद आया, मन्ना दे का गाया, बंगाली गाना

सोबाई तो सुखी होते चाय, केउ सुखी होय केउ होयना

(सभी सुख चाहते हैं, कुछ ही सुखी हो पाते हैं)

याद आयी बर्नार्ड श की लिखी किताब

जिसमे लिखा था असुखि होने के उपाय

मैं सोचता रहा इन दोनों के बारे में

सुबेरे सुबेरे, लगा मिल गया मुझे, सुखी रहने का उपाय

फिर लगा, सुख का विश्लेषण सुख नहीं देता

मेढक को जानने के लिए मेढक को मरना पड़ता है

लेकिन फिर भी मेंढकों का विच्छेदन बंद न हुआ

सुख की सोच को आगे बढ़ाने का मुझे मौका मिला

मैंने पाया रतन धन, न सही संतोष धन

‘रतन धन धुरी सामान’ मानने को मन न चाहा

मैं प्रसन्नचित्त, चिरंतन सत्य का पीछा करना छोड़कर

क्षणिक सत्य की खोज में निकल पड़ा

जाना सुख का आगमन अनियमित, और प्रस्थान अनिश्चित है

मैंने पूंछा, क्या हम खुश रहने के लिए बनाये जाते हैं

सीधा उत्तर न मिला

कुछ लोगों का मानना है, मायावी मगज

खुशी का भंडार साथ लेकर चलता है

मेरा मायावी मन क्या चाहता है नहीं मालूम

कभी जो चाहा मिला, फिर लगा क्या हम यही चाहते थे

कभी लगा जो चाह रहे हैं पाने योग्य हैं क्या

धन्य हैं वो जो अपनी कल्पना में

खुशियों की दुनिया बसा लेते है

बीते कल की कल्पना में आनंद पा लेते हैं

वो पहचानते हैं यादों में छुपी चिंताओं से मुक्ति की शक्ति

यादें उन्हें देती हैं कल का सुखद एहसास

अचेतन विचार बादलों की तरह आते हैं, और जाते हैं

चेतन विचार स्वीकारते और नकारते हैं आसमान की तरह

रचनात्मक दृश्यांकन के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं सिर्फ विचार

आवश्यकता पड़ती है भावनाओं और उमंगों के संगम की

'हैप्पीनेस सेट पोईन्ट' निर्धारित करती है सुख-असुख

विकल्पों की प्रचुरता कभी कभी असुख का आवाहन करती है

कुछ आदर्श परिस्थितियों के परे भी सुख का अनुभव करते हैं

कुछ सबकुछ पाकर भी दुःख की कामना करते हैं

क्या चाहिए - सुखद या सुन्दर, अभिराम या आनंद

विषय कठिन है, शायद समय का बदलता स्वाभाव

मीमांशा कर सकती है इस तरह के प्रश्नों की

कहते हैं, इश्वर क्या हैं, नहीं पता

क्या नहीं हैं, है पता

ये भी कहते हैं, सुख क्या हैं, नहीं पता

क्या नहीं हैं सुख , है पता

हाथी की पीठ पर सवार हूँ

लगाम मेरे हाथों में है

दिशा दिखा सकता हूँ

केवल हाथी की स्वैच्छा से

मुक़ाबले मैं असमर्थ हूँ

यही दशा है सुख की

हाथों में है, बालू की तरह

कब निकल जायेगी पता नहीं

दर्द की कैद से निकलने के बाद

सुख की अनुभूति दूनी हो जाती है

फिर भी नहीं चाहता कोई, दर्द की क़ैद

सूरज साथ लेकर आती है दिन का शोर

शोर से बचना है, भागना पड़ेगा, दिन छोड़कर

भाग पाओगे, छुप पाओगे, नकली उजाले की छाओं में