दीवानगी की हद, जीत की तमन्ना

दीवानगी की सारी हदें पार कर

पहुंचा मैं जीते शरणार्थियों के शिविर

सभी किसी न किसी को परास्त कर पहुंचे थे

चेहरे पर मुस्कान की जगह थकान थी

जीतने का मूल्य चुकाकर जो आये थे

प्रगति का आकर्षण, भिन्न मापदंड, भिन्न विचारधाराएं

हारने का भय अंग प्रत्यंग शिथिल कर देती है

जो देख नहीं पाते हैं, जो सुन नहीं पाते हैं

मुझे उनकी आँख कान बना दिया गया

अक्सर भूल जाता था, मेरा दिया काम

मैं भी तो जीतकर आया था

मैं भी तो शरणार्थी था

मैं भी तो बहुत कुछ खोकर आया था

जीतने के बाद, बहुत कुछ पाया

लेकिन खोया पाने से अधिक

मुझे मालूम न था

जीतने का मूल्य चुकाना पड़ता है

बच्चो से, धर्मपत्नी से, माँ से, दोस्तों से

आँखों में आँखे डालकर बातें करने से डर लगने लगा

उनके साथ बैठकर भोजन करने से डर लगने लगा

डर लगने लगा, बेटी कहीं कह न बैठे

“पिताजी आप कितने बदल गए हैं

लगता ही नहीं, कभी आप मेरे पिताजी थे “

शरणार्थियों के बीच बिना भय के जिया जा सकता है

अपनों के बीच किसी तरह का भ्रम लेकर जीना मुश्किल है

अपनों की आँखों में गिरना कितना भयानक होता है

नहीं जान सकते हैं वो, जो कभी गिरे नहीं

धीरे धीरे जीत का भ्रम उतरने लगा

एक बार फिर से, गीता पर हाथ रखकर कहने को मन कर आया

बेटी, मैं नहीं बदला, कुछ सालों के लिए भटक गया था

मैं वही तुम्हारा पिता हूँ, जो साइकिल की डंडी पर बैठाकर

तुम्हे हर रोज़ स्कूल ले जाया करता था

और तुम मुझे अपने हर सपने का भागीदार बनाया करती थी

मैं तुम्हारे हर सपने का साथी बनना चाहता हूँ

मैं फिर से पथ भ्रमित नहीं होना चाहता

मैं दीवानगी की हर हद पार नहीं करना चाहता

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh