पिता का सूटकेस

पिता ने पुत्र को अपने लेखों से भरे

सूटकेस देते हुए कहा, पढ़ने को

उनकी मृत्यु के बाद

पुत्र सूटकेस को दूर से तकता

रहस्यमय वजन था, सूटकेस का

पुत्र डरता सूटकेस के भार से

उसे डर लगता पिता के लेखक होने से

उसे डर लगता पिता को अधिक जानने से

उसे डर लगता कहीं अधिक टटोलने पर

पिता के स्थान पर कोई और न दिख जाये

पिता के स्थान पर उसे लेखक न मिल जाये

उसे गवारा न था पिता का स्थान कोई और ले

अपना पहला उपन्यास समाप्त करने के उपरांत

कांपते हाथों से पुत्र ने पिता को पांडुलिपि समर्पित की

दो सप्ताह के बाद जब पिता घर लौटे

पुत्र ने दरवाजा खोला

पिता ने कुछ न कहा

केवल बाँहों में भींचा

पिता को पुत्र का लेखन पसंद आया

अजीब सा सन्नाटा छा गया

जब पिता ने पुत्र से कहा

तुम विजयी हो, एक दिन पुरस्कार तुम्हारा होगा