प्रातः स्मरणीय

वसंत के शुरुआती दिनों की बात है

मैं गया माँ से मिलने, बीमार थी

प्रतिक्रियाएं कमजोर होती जा रही थी

याददास्त ने अब भी छोड़ा न था साथ

मेरा पास बैठना माँ को अच्छा लगा

माँ की लुप्त होती दुनिया में मैं था

कोई बदलाव न था, माँ के कमरे में

वोही बिस्तर, वोही तस्वीरें

सारी ऊर्जा समेटकर माँ ने मेरी और देखा

लगा, मानो माँ पूछ रही हैं, कब आये, कैसे हो

मैंने नहीं पूछा, माँ तुम कैसी हो, क्योंकि प्रश्न निरर्थक था

अगर पूछा होता, माँ ने कहा होता, अच्छी हूँ

मैं देर तक निहारता रहा माँ को, कुछ न बोला

लगा, माँ के सान्निध्य से सुखद और कुछ नहीं हो सकता

सोचता रहा कितनी सारी बातें

सोचता रहा कभी मैं भी छोटा था

शायद, माँ कहना चाहती थी

"याद है तुम्हें जब तुम घर देर से लौटते थे

कितनी परेशां हो जाया करती थी मैं

और तुम नाराज़ हो जाया करते थे

मैं कहती थी, समझोगे उस दिन, जिस दिन पिता बनोगे

समझोगे, क्यों माँ का मन, छोटी-छोटो बातों पर, इतना उतावला हो जाता है”

शायद माँ कहना चाहती थी

"बिस्तर पर पड़े पड़े दिन भर इधर उधर की सोचती रहती हूँ

आशंका मन में लिए सोने जाती हूँ, क्या देख पाऊँगी, एक और सुबह"

कैसे मिलेगी माँ को, अपनी पीड़ा से निवारण

मरण का वरण न चाहता कोई, हर दिन

कठिन होती है, अंत की कामना, फिर भी मैंने की

माँ को अपने सभी बंधनो से मुक्त किया मैंने

प्रार्थना की, कि माँ भी मुक्त हो सके, अपने सभी बंधनो से

एक दिन, शरत काल में, पीड़ा का मुक्तिदूत बनकर

अंत आया माँ को लेने

आकर भी, न ले जा सका, माँ को

है माँ, मेरे अंतर्मन में, सुबह की प्रार्थना बनकर

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