अदृश्य द्वीप

उस दिन, अपने घनिष्ट मित्र को खोया सा पाया मैंने

कुछ दिन पहले उसने पिता खोया था

पूंछा, क्या हुआ, उसने कहा

तुम जानते हो, फिर भी, फिर से कहने को मन कर आया

पिताजी ने मुझे जो चाहा करने दिया

कभी न टोका, कभी न रोका

लगता था, इतनी आज़ादी

पिता क्या ऐसे ही होते हैं

फिर लगता था, मैंने भी तो उनसे कभी कुछ नहीं पूंछा

किसी तरह की बाध्यता की मांग करते मैंने कभी नहीं देखा उन्हें

न देखा, बिन मांगे, किसी को परामर्श देते हुये

मुझसे कभी कुछ न पूंछा, तो क्या मैं भी कुछ न बतलाऊंगा

पिता का अभिमान कौन समझेगा

इन सब के बावजूद, अजीब सा लगता था

जब वह मुझे मेरी योग्यता से अधिक ऊँचाई पर मापते थे

पिताजी डरते थे, अपनी बढ़ती उम्र से

उन्हें डर था, उम्र के बोझ का

किसी का बोझ बनने से पहले ही, पिताजी चल बसे

मेरा दोस्त, प्रायः, अपने आप को कठघरे में खड़ा करता है

क्यों न समझ पाया वो पिता को

सहज सरल थे इसलिए, या

कहने लायक कुछ भी नहीं था उनमें, इसलिए

संपर्क के, भौतिकवादी और भावनात्मक, दो पहलु होते हैं

प्रतिबद्धता और अपेक्षा के बीच की कड़ी को समझना पड़ता है

तर्कसंगत और तार्किक के बीच रेखा खींचने की जरूरत पड़ती है

संभव और असंभव का प्रभेद समझना पड़ता है

दूर द्वीप देखकर, पास पहुंचे, न मिला द्वीप

द्वीप के अदृश्य हो जाने पर, हताश न हो

कुछ द्वीप अदृश्य होकर भी

अदृश्य नहीं होते हैं, मन के भास्कर्य से

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh