पूर्ण चंद्र की बात

मैंने पूर्ण चंद्र को

तारों भरी रात में

आसमान से निकलते देखा

रात शांत थी

आसमान साफ था

कुछ देर बाद

तैरते बादल, आसमान पर

अपना रंग बिखेरने लगे

बदलते क्षितिज में

पक्षी उड़ रहे थे

चाँद एक चित्र की तरह दिख रहा था

बदलती व्याख्याओं के साथ

इतना नाजुक, जैसे कोई सूक्ष्म बिंदु निलंबित

असीम आकाश की आत्मा को रोशन करने

एक मशाल की तरह खड़ा है

भोर के आह्वान पर चला जायेगा

अंधकार के परे

मैंने एक लौकिक कक्ष देखा

सौहार्द की रोशनी से भरा

शक्त सर्दी के मौसम में

मैंने एक गौरैय्ये को

खुशी से झूमता

कक्ष में प्रवेश करते देखा

कुछ देर बाद, मैंने उसे

गायब होते भी देखा

नहीं जानता कोई

वो कहाँ गया

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh