अकल-नक़ल

मैं उसकी कहानी चुराने के जुर्म में पकड़ा गया मैंने सफाई देते हुए कहा मेरी कहानी, चुराई हुई नहीं, मेरी कहानी है मैंने जिया है इस कहानी को किसी और ने भी जिया इस कहानी को तो मैं क्या करूँ मैंने अपनी कहानी को अपनी तरह से जिया है उसने अपनी कहानी को अपनी तरह से जिया है किसी और ने इसी कहानी को किसी और तरह से जिया होगा कोई और इसी कहानी को किसी और तरह से जियेगा क्या इस कहानी को जीने का हक़ सिर्फ उसका था जिसने मुझ से पहले इस कहानी को जिया है असल नक़ल का भेद समझने वाला केवल एक है जिसके बारे में सुन रखा है सभी ने, देखा किसी ने नहीं उस असल ने अपनी अकल से एक सुबह की रचना की थी हर रोज़ वही सुबह घूम फिर कर फिर आ जाती है नयी सुबह बनकर, तो असल क्या करे