बचपन की बुढ़िया

एक बूढ़े शहर में एक बुढ़िया रहती थी

बुढ़िया को परेशानी थी हर बात से

उसे नाराजगी थी हर एक से

शहर के बच्चे मानने को तैयार न थे

कि बुढ़िया भी कभी सुंदर बच्ची थी

बुढ़िया का शहर भी बुढ़िया जैसा

कोई मानने को तैयार नहीं

कि शहर भी कभी जवान था

शहर गंदा हो गया है

लेकिन वो भुला नहीं

एक समय हर रोज़

उसकी धुलाई होती थी

शहर बूढ़ा हो गया है

लेकिन बासी नहीं हुआ है

उसे याद है अपना बचपन

उसे याद है बचपन की बुढ़िया

जो एक सुंदर बच्ची थी

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh