कुर्सी

मैं निर्जीव

मेरे चार पैर, दो हाथ

खुद का सर नहीं मेरे पास

मेरे मेरुदंड की गतिशीलता

निर्भर करती है

मुझ पर बैठनेवाले पर

मुझ पर बैठने वाला

अपने कर्मो से मेरा अधिकारी बनता है

मेरे मेरुदंड की गतिशीलता का उत्तरदायित्व भी उसका है

आश्रित हैं हम एक दूसरे पर

जैसे आश्रित हैं निर्जीव और सजीव

उसकी हर निर्णय का अधिकारी वो

मनन की जिम्मेवारी मेरी है

अधूरे हैं हम एक दूसरे के बिना

हम मिलजुल के अपने सिद्धांत बनाते हैं

मैं उड़ नहीं सकता

विराजमान है मुझ पर, मेरे पंख

मेरे निश्चल हाथ

देते हैं लिखने की क्षमता

औरों के हाथों को

हम मिलजुलकर किस्से गढ़ते हैं

मेरा अधिकारी जब मेरा अनुचर बनता है

मैं गर्वित अनुभव करता हूँ

मैं निर्जीव

निर्भर करता है मुझ पर

भविष्य कितनों का

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh