अपराजित

हर कोई अपनी दुनिया अपनी तरह से जीना चाहता है

हर कोई अपनी दुनिया अपनी तरह से देखना चाहता है

समय बदल देता है जीना या देखना

समय के साथ कुछ मूल्य लुप्त हो जाते हैं

तो कुछ निकट आ जाते हैं

पहली बार जब मैंने अपराजित देखी थी

तब मैं अपु की उम्र का था

स्पष्ट रूप से याद नहीं, कैसी लगी होगी

अपू के दृष्टिकोण से मैंने फिल्म देखी होगी

मां के मरने पर मैंने रोया होगा

समय बदल देता है दृष्टिकोण

बदल जाते हैं प्रसंग

तब मैं एक बेटा था

अब मैं एक पिता हूं, और एक बेटा भी

हाल में मैंने अपराजित फिर से देखा

यह एक अलग अनुभव था

मां-बेटे का इससे सजीव चित्रण संभव नहीं

मेरी सहानुभूति पूरी तरह से माँ के साथ थी

मैं रोया जब अपू घर छोड़कर कोलकाता के लिए रवाना हुआ

या जब मां अपने बेटे के घर लौटने का इंतजार कर रही थी

माँ की भावनाएँ कितनी सूक्ष्म होती हैं

अकेलापन था, लेकिन उम्मीद थी कि एक दिन उसका बेटा

कुछ बनकर घर लौटेगा

मेरे लिए सबसे ख़ुशी का पल था जब बेटा कोलकाता जानेवाली ट्रेन

जानबूझकर छोड़ देता है

ताकि वह रह सके अपनी माँ के साथ

मुझे लगा कि मैं उनकी खुशी का हिस्सा हूं

मैं अपराजित हूँ

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh