सम-सम्मान

किसी ने मुझ से पहले सोचा था इसलिये मैं क्यों सोचूं की यह सोच मेरी नहीं है कई सोच आसमान में तैर रहे हैं हर सोच को तो मैं अपनी सोच नहीं बना लेता हूँ जो मेरी है उसको ही मैं अपना बनाता हूँ सम-सोच की प्रकृतिवाले ने अपनी सोच को आसमान में छोड़ दिया मुझसे पहले तो मैं क्या करूँ सोचना छोड़ दूँ? या यह सोचकर अपनी सोच को आसमान में न छोडूं कि किसीने मुझसे पहले छोड़ दिया है, या होगा? किसी और की सोच को अपनी तरह से सोचना उसकी सोच का सम्मान है सम्मान अर्जित करनी पड़ती है समान से अर्जित सम्मान से बड़ी नहीं कोई सम्मान

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