एक समय पर दो बरसा दे

यह कहानी, स्टेशन के एक कुली की,

जो दिन भर बोझ उठाता है और

रात को कविता लिखता है, अपनों के लिये ।

अपनों को पसंद उसकी कविता, इतनी की

दिन का बोझ भारी लगने लगता है ।

लेकिन कविता भूख मिटा नहीं पाती ।

क्या करे ?

खाली पेट सो नहीं पाता,

दो दो पेट कैसे भरे ?

एक वैज्ञानिक विज्ञान की बातें लिखता है ।

बिकती हैं उसकी विज्ञान कि बातें, महंगे दामों में ।

कविता का शौक भी रखता है।

जब वो लिखता है कविता की बातें,

कोई नहीं पढ़ता बिन पैसे भी ।

क्या करे ? छोड़ दे कविता की बातें करना?

जी सकता है विज्ञान कि बातें लिखे बिना,

जी नहीं सकता कविता लिखे बिना ।

क्या करे ? जीकर मरे ?

"एक समय पर दो बरसा दे,

बादल के संग आँख भी बरसे,

चारो ओर जल-थल जल-थल,

फिर भी प्यासा मनुआ तरसे

एक समय पर दो बरसा दे। "

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh