धर्म और अधर्म

विजय के हाथ किसी ने लिख दिया था मेरा बाप चोर है

इस लांछन ने उसे जीने न दिया

खुद चोर बन गया ममता का मूल्यांकन पैसों से करने लगा विजयी होकर भी विजय हार गया तोड़ दिए दिवार संस्कार के न मिटा पाया मन से विजय मेरा बाप चोर है का धब्बा दुर्योधन के माथे पर किसी ने लिख दिया था उसका पिता अँधा है न मिटा पाया था मन से दुर्योधन बाप के अंधेपन का लांछन सच और झूठ में कभी युधिष्ठर जीतते है तो कभी दुर्योधन

कहा जाता रहा है युद्ध है सब कुछ चलता है लड़ाई लड़नी होगी अपशब्द बोलने पड़ेंगे धर्मयुद्ध आपसी युद्ध बन जाते है फिर एक दिन जमीर खींच लाती है फिर से धर्म के पास और इस प्रकार धर्म और अधर्म का युद्ध युग युग से चलता चला आ रहा है

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