जीवन संगिनी

दुर्गा पूजा की अष्टमी का दिन था

संध्या आरती के समय

मुझे किसी के मृदु स्पर्श की अनुभूति हुई

महकते धूप और धुएं के बीच

मुझे दो प्रतिमाएं दिखी

एक नृत्यांगना, तो दूसरी आनंदमग्ना

दो - दो प्रतिभाओं के बीच

मैं खो सा गया

धुएं की लकीरें जब छंटी

एक प्रतिमा के दर्शन हुये

दूसरी का कहीं पता न चला

भीड़ में खो गई कहीं

आँखों से लेकिन ओझल न हुई

कई वर्षों बाद, उसके ही आमंत्रण पर

उसके ही आंगन में, वो मिली मुझको

उसी नृत्य के वेश में

उसी स्पर्श की अनुभूति के साथ

जैसे पहले से मिलना निश्चित हो

छवि या प्रतिमा मात्र न थी वो

वो थी मेरी कल्पना का मूर्त रूप

मेरी जीवन - संगिनी