संतोष

अगर दो आने की जगह

दो रुपए जेबखर्च को मिले होते

अगर मुझे टोकने वाला कोई न होता

लेकिन ऐसा कुछ न हुआ

जेबतंगी रही, भरनी पड़ी जेब, मूंगफली से

पाबंदी रही समय की

अगर समय से पहले सब कुछ मिल जाता

शायद न जान पाता

चाहत और जरूरत का भेद

समझ न आती आज़ादी के माने

समय आने पर न मिलता

मिलने का संतोष

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh