दो पैसे की ख्वाहिश

देखा है मैंने तुमको कानपूर की गलियों में

नंगे घूमा करते थे, दोस्तों के साथ

देखा है मैंने तुमको आईने में, स्वयं को खोजते हुये

देखा है मैंने तुमको चुप्पी की गाँठ बांधे

घूरते हुये, अपने आकाश को, अपनी धरती को

देखा है मैंने तुमको, समय के बहाव को शब्दों में क़ैद करते हुये

इस आशा में, शायद कहीं मिल जाये, जिसकी तुम्हें तलाश है

गन्दा है , सिर्फ रिक्शे चलते हैं, चमड़े से बने इस शहर में रहना मुश्किल है

गन्दा है तो है, शहर तो मेरा है

जिस शहर में भाईसाब रहते हैं, गन्दा कैसे हो सकता है

आजकल जब जाता हूं, कुछ- कुछ दिखता है, लेकिन सिर्फ दो चार दिन

फिर दिखता है, एक चौराहे से दूसरे तक का सफर, दिखता है कोरा मैं

जो एक क्लर्क बनने की ख्वाहिश रखता था

दो पैसे की ख्वाहिश, वो भी पूरी न कर पाया

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© 2017 by Dr Purnendu Ghosh