जीवन का पाठ्यक्रम

मुझे हमेशा याद रहेगी जो मेरी माँ ने एक बार मुझसे कहा था। माँ से मैंने कहा, मैं फेल हो गया हूँ। माँ ने कहा, मैं फेल होने लायक छात्र नहीं हूं। जब मैंने माँ को बताया तो वह मुझसे भी अधिक परेशान हो गई, लेकिन माँ का मेरे प्रति व्यवहार में निराशा की कोई झलक नहीं दिखी। माँ ने कहा कि मैं असफल रहा क्योंकि मैंने ठीक तरह से पढाई नहीं की। माँ को पूरा विश्वास था कि अगर मैं चाहूँ तो बेहतर कर सकता हूं, लेकिन अगर मैं चाहूं तो। मुझे आश्चर्य हुआ कि मा ने मुझमें क्या देखा, जो मैं खुद नहीं देख पाया। मैंने मा से पूछा कि वह मुझको मुझसे ज्यादा कैसे जानती है। वह चुप रही। कुछ नहीं बोली। मैं अगले वर्ष उसी परीक्षा के लिए फिर से उपस्थित हुआ। इस बार मुझे मेरी माँ की बात पर विश्वास था । मैं अपनी क्षमताओं के प्रति अधिक आश्वस्त हो गया । इस बार मेरा परीक्षाफल काफी अच्छा रहा। मेरे जीवन का पाठ्यक्रम बदल गया। मा के दृढ़ विश्वास ने मुझमें उत्साह पैदा किया। माँ को मालूम था, उसका मेरे प्रति विश्वास काफी नहीं है मेरी सफलता के लिये। सफलता के लिये चाहिये स्वयं का स्वयं के प्रति विश्वास । मा को मालूम था कि आत्मविश्वास का प्रवेश आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से होता है । कनविक्शन पर्याप्त नहीं है। अच्छा करने के लिए बुद्धिमत्ता की भी जरूरत पड़ती है। इच्छाशक्ति और बुद्धि के बीच बेमेल संबंध असंतोष का परिणाम बन सकते है। माँ का दृढ़, इच्छाशक्ति पैदा कर सकती है, बुद्धि का विस्तार नहीं। बुद्धि जन्मजात है और इसमें सुशीलता प्रदान की जा सकती है । जीवन में माँ की भूमिका का कभी अंत नहीं होता है। शायद मेरी विफलता ने मेरी सुप्त बुद्धि को जगा दिया था । मा ने मेरी विफलता में आसन्न खतरे को देख लिया था। फिर भी माँ ने मुझ पर अपनी 'इच्छा' लागू नहीं की। माँ ने मुझे अपना विकल्प चुनने का मौका दिया।