जीने की कला
- Purnendu Ghosh
- Nov 2, 2025
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विज्ञान जीवन के उद्गम, उसके क्रियातंत्र और उसके विकास की खोज है। कला भावों को आकार देती है, क्षणों को अर्थ देती है, और अपूर्णताओं में सौंदर्य खोजती है। विज्ञान की सूक्ष्मता और कला की सहजता के बीच की संभावना को हम “सौंदर्य” कहते हैं।
हर जैविक प्रक्रिया, अपने भीतर एक लय और विन्यास रखती है। जब हम इन्हें केवल कार्य के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की कल्पनाशील अभिव्यक्तियों के रूप में देखते हैं, तो विज्ञान में भी एक कलात्मक आभा झिलमिलाने लगती है।
मैंने यह कला विज्ञान का अभ्यास करते-करते सीखी है। कभी-कभी अपनी पहचान की तलाश मुझे जंगलों में भटका देती है; एक स्वप्न जैसा अनुभव, जहाँ मैं भोर की धुँधली रोशनी में भटक जाता हूँ। खो जाने की अनुभूति बहुत व्याकुल करती है, जब तक मैं अचानक जाग न जाऊँ और देखूँ कि मैं अपने घर में, अपनी सुरक्षित जगह पर हूँ।
भूल-भुलैया से स्वयं को पुनः खोज लेने की कला कितनी आश्वस्त करने वाली होती है। शायद यही इस कला का सार है — भटक कर खुद को फिर से पा लेना।



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